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तेल के बाद अब डेटा पर जंग? ईरान-अमेरिका तनाव अब इंटरनेट तक पहुंचा, टेक कंपनियों को क्यों सता रहा ज्यादा डर

Internet Crisis: दुनिया के मध्य पूर्व हिस्से में तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले 3 महीनों से यह तनाव लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इसे कम करने की कुछ कोशिशें भी हुई हालांकि वो नाकाम रहीं. यही वजह है कि अब तक इस क्षेत्र में शांति नहीं हो पाई है. तेल संकट से जूझ रही दुनिया के सामने एक और समस्या की आहट हो रही है. तेल के साथ-साथ अब लोगों को आने वाले समय में इंटरनेट नेटवर्क की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है.

 

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की नजर अब उन अंडरसी इंटरनेट केबल्स पर है जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नीचे से गुजरती हैं. यही केबल्स एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों के बीच करोड़ों लोगों का इंटरनेट और डेटा ट्रैफिक संभालती हैं. रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान से जुड़े कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म ने इन केबल्स पर टैक्स लगाने या जरूरत पड़ने पर दबाव बनाने की बात कही है. इससे दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों और कई देशों की चिंता बढ़ गई है.

 

विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया का ज्यादातर इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक समुद्र के नीचे बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल्स से गुजरता है. इनमें बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड सर्विस, वीडियो कॉल, OTT प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया और AI डेटा तक शामिल है.

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क्या होगा असर?

अगर स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास मौजूद इंटरनेट केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो असर सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहेगा. बल्कि इसका असर पूरी दुनिया पर देखने को मिल सकता है. इसके कारण आपके इंटरनेट स्पीड धीमी हो सकती है. WhatsApp, Instagram, Netflix जैसी सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं.

 

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इसके साथ साथ ऑनलाइन बैंकिंग और स्टॉक मार्केट पर असर पड़ सकता है. क्लाउड सर्वर और AI सिस्टम में दिक्कत आ सकती है. भारत समेत कई देशों के IT और आउटसोर्सिंग सेक्टर पर असर पड़ सकता है और अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रांसफर में देरी हो सकती है.

 

किन मुसीबतों का करना पड़ सकता है सामना?

विशेषज्ञों का कहना है कि इन केबल्स की मरम्मत आसान नहीं होती है. समुद्र के अंदर खराबी ढूंढने और ठीक करने में कई हफ्ते या महीनों का समय लग सकता है, खासकर तब जब युद्ध जैसी स्थिति बनी हो. माना जा रहा है कि तेल सप्लाई के बाद अब डिजिटल नेटवर्क भी भू-राजनीतिक दबाव का नया हथियार बनता जा रहा है. यही वजह है कि दुनिया भर की टेक और टेलीकॉम कंपनियां इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं ।

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दिनेश कांशी

"दिनेश कांशी पिछले 6 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। डिजिटल मीडिया की गहरी समझ और खबरों को निष्पक्षता से पेश करने के उनके अनुभव ने 'भारत की आवाज़' को एक नई पहचान दी है। वे पत्रकारिता की सटीकता और सत्यता को सर्वोपरि मानते हैं।"

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